यक्षिणियों को राक्षस, भूत, प्रेत, डायन या पिशाचिनी मानने की धारणा किसी एक शास्त्र, कथा या काल की देन नहीं है, बल्कि यह हजारों वर्षों में धीरे-धीरे निर्मित हुई एक सामूहिक भ्रांति है, जिसकी जड़ें मानव-भय, अधूरा ज्ञान, सत्ता-संघर्ष, और आध्यात्मिक पतन में गहराई तक फैली हुई हैं; मूल रूप से यक्षिणी वैदिक और पौराणिक परंपरा में देवी-तत्व का ही एक स्वरूप हैं—वे प्रकृति, चेतना, सौंदर्य, संरक्षण और सूक्ष्म ऊर्जा की अधिष्ठात्री मानी गई हैं, परंतु जैसे-जैसे समाज ने आध्यात्मिक चेतना से अधिक सामाजिक नियंत्रण, नैतिक कठोरता और भय-आधारित व्यवस्था को प्राथमिकता दी, वैसे-वैसे यक्षिणी जैसे स्वतंत्र, अप्रतिबंधित और स्त्री-प्रधान देवी-तत्व समाज के लिए असहज होते चले गए। यक्षिणियाँ न तो वैदिक यज्ञ-व्यवस्था में बंधती थीं, न ब्राह्मणीय कर्मकांड की सीमाओं में समाती थीं, न ही वे पुरुष-सत्ता द्वारा परिभाषित “आदर्श स्त्री” की छवि में फिट होती थीं; वे स्वतंत्र थीं, स्वेच्छा से प्रकट होती थीं, प्रेम और आकर्षण को पाप नहीं मानती थीं, और मनुष्य के भीतर की काम-ऊर्जा को नकारने के बजाय उसे समझने और संतुलित करने का कार्य करती थीं—और यही विशेषताएँ धीरे-धीरे उन्हें संदिग्ध, भयावह और “अनियंत्रणीय” बना देती हैं।
लोक-मानस में पहला बड़ा परिवर्तन तब आया जब काम, रति और आकर्षण को आध्यात्मिक ऊर्जा के रूप में देखने के बजाय नैतिक अपराध की तरह देखा जाने लगा; यक्षिणियाँ क्योंकि प्रेम, सौंदर्य, रति और भावनात्मक चेतना से जुड़ी थीं, इसलिए उन्हें सहज ही उन शक्तियों के साथ जोड़ दिया गया जिन्हें “मनुष्य को पथभ्रष्ट करने वाला” कहा गया। जिस समाज में संयम का अर्थ दमन बन जाए, वहाँ संतुलन सिखाने वाली देवी भय का कारण बन ही जाती है। यक्षिणी न तो तपस्या से भागने को कहती थीं, न संसार छोड़ने को—वे कहती थीं कि संसार में रहते हुए भी चेतना जाग्रत रह सकती है, और यही विचार धीरे-धीरे उन पर “मोहिनी”, “भ्रम पैदा करने वाली”, “पुरुषों को गिराने वाली” जैसी छवियाँ थोपने का आधार बन गया। वास्तव में यक्षिणी पुरुष को नहीं गिरातीं, बल्कि उसकी कमजोरियों को उजागर करती हैं, और जो समाज आत्म-चिंतन से डरता है, वह सत्य दिखाने वाली सत्ता को दानव बना देता है।
दूसरा बड़ा कारण स्त्री-स्वतंत्रता और स्त्री-ऊर्जा का भय है; यक्षिणियाँ किसी पति, किसी देव, किसी आश्रम या किसी मर्यादा में बंधी नहीं थीं—वे स्वायत्त थीं, स्वयं निर्णय लेने वाली थीं, और यही बात पितृसत्तात्मक समाज के लिए सबसे अधिक असहज थी। धीरे-धीरे स्वतंत्र स्त्री-देवी को “डायन”, “चुड़ैल” और “भटकाने वाली” कहकर बदनाम करना शुरू किया गया, ताकि समाज को यह संदेश दिया जा सके कि जो स्त्री सीमा से बाहर जाएगी, वह भयावह होगी। यक्षिणी का डायन में बदल जाना केवल धार्मिक नहीं, बल्कि सामाजिक राजनीति का परिणाम था। जिस स्त्री-ऊर्जा को कभी शक्ति माना जाता था, उसे बाद में खतरा घोषित कर दिया गया।
तीसरा कारण तांत्रिक ज्ञान का पतन और विकृतिकरण है; यक्षिणी-तत्व मूलतः सूक्ष्म तांत्रिक चेतना से जुड़ा हुआ था—जहाँ मंत्र, ध्यान और भाव तीनों समान रूप से महत्वपूर्ण थे। लेकिन जब तंत्र से साधना निकल गई और केवल सिद्धि, वशीकरण और तात्कालिक लाभ रह गया, तब यक्षिणी-तत्व को भी उसी गंदे चश्मे से देखा जाने लगा। कुछ अज्ञानी या लोभी साधकों ने यक्षिणियों के नाम पर भय, वासना और अंधविश्वास फैलाया, जिससे लोक-मानस में यह धारणा बनी कि यक्षिणियाँ मनुष्य को खा जाती हैं, उसकी ऊर्जा चूस लेती हैं, या उसे पागल कर देती हैं—जबकि वास्तव में ऐसा उन लोगों के साथ हुआ जो बिना मानसिक, भावनात्मक और नैतिक परिपक्वता के सूक्ष्म शक्तियों से खेलने लगे। दोष यक्षिणी का नहीं था, पर भय की कहानी उसी के नाम लिख दी गई।
चौथा कारण लोककथाओं और मौखिक परंपराओं का विकृत रूपांतरण है; गाँवों, जंगलों और सीमांत क्षेत्रों में रहने वाले लोगों ने यक्षिणियों को कभी संरक्षिका, कभी चेतावनी देने वाली शक्ति के रूप में देखा, पर समय के साथ ये कथाएँ डरावनी कहानियों में बदलती गईं। जहाँ यक्षिणी किसी गलत मार्ग पर चलने वाले को रोकती थीं, वहाँ कहानी बन गई कि वह उसे मार देती है; जहाँ वह मोह को उजागर करती थीं, वहाँ कहा गया कि वह भ्रम पैदा करती है। लोककथा जब ज्ञान से कट जाती है, तो वह भय बन जाती है।
पाँचवाँ और अत्यंत महत्वपूर्ण कारण औपनिवेशिक और आधुनिक प्रभाव भी है; अंग्रेज़ी शासन और पश्चिमी दृष्टि ने भारतीय देवी-तत्वों को या तो “मिथ” कहा या “डेमोनिक फिगर” के रूप में वर्गीकृत किया। यक्षिणी जैसी सूक्ष्म, काम-चेतना से जुड़ी देवी पश्चिमी नैतिक ढाँचे में फिट नहीं बैठीं, इसलिए उन्हें आसानी से “ईविल स्पिरिट”, “फेमेल डेमन” या “सिड्यूसर” कह दिया गया, और यही वर्गीकरण आधुनिक शिक्षा, फिल्मों और साहित्य के माध्यम से जन-मानस में बैठता चला गया। हॉरर फिल्मों, टीवी सीरियल्स और कहानियों ने यक्षिणी को डायन या पिशाचिनी के रूप में दिखाया, जिससे नई पीढ़ी ने उन्हें देवी के रूप में देखना ही छोड़ दिया।
वास्तविकता यह है कि यक्षिणी कभी भी भूत, प्रेत या राक्षस नहीं थीं; भूत और प्रेत असंतुष्ट आत्माएँ मानी जाती हैं, राक्षस तामसिक अहं का प्रतीक हैं, पिशाचिनी विकृत भूख का—जबकि यक्षिणी चेतन शक्ति हैं, जिनका अस्तित्व जीवित ऊर्जा के रूप में है, मृत आत्मा के रूप में नहीं। यक्षिणियाँ भय से नहीं, संतुलन से जुड़ी हैं; वे अंधकार नहीं, बल्कि उस प्रकाश का प्रतिनिधित्व करती हैं जो मनुष्य के भीतर के अंधकार को देखने का साहस देता है।
अंततः यक्षिणियों को राक्षस मानने का कारण यह नहीं कि वे वैसी थीं, बल्कि यह है कि मनुष्य ने स्वयं अपने भीतर की इच्छाओं, भय और असंतुलन का दोष उन पर डाल दिया। जो समाज प्रेम को समझने के बजाय दबाता है, वह प्रेम की देवी को डायन ही कहेगा; जो चेतना से डरता है, वह चेतना की संरक्षिका को राक्षस बनाएगा। यक्षिणी देवी थीं, हैं और रहेंगी—भले ही लोक-भ्रांतियाँ उन्हें कुछ भी कहें—क्योंकि सत्य समय से नहीं बदलता, केवल दृष्टि बदलती है।